Shabd

From My First Anthology Book

शब्द :

शब्द कहने को तो बहोत छोटे होते है पर होते है बड़े। जब भी ये दिलों पर अघात करते है तो मानो की जैसे जो प्राण बचे है शरीर में वो भी अब ना रहे ऐसा लगता है जैसे शब्दों के बाण ने दिल को भेद दिया हो और आप वही खड़े - खड़े परास्त हो गए इस बाण के भेदन से पीड़ाएं इतनी होती है की ये धीरे - धीरे आपकी चेतना शक्ति को खत्म कर देती है और फिर आपको ना किसी की बाते सुनाई देती है और ना किसी का कुछ करना दिखाई देता है तकलीफे धीरे धीरे इतनी बढ़ जाती है की आपकी इच्छा शक्ति भी समाप्त हो जाती है ।

आपकी इच्छा शक्ति समाप्त होने पर आप उस दुनिया में चले जाते है जहा से आपका आना मुमकिन नहीं होता फिर शरीर दिखाई तो देता है पर जान उस शरीर में बची नही होती ।

शब्द होते तो दो और आधे शब्द से मिलकर बने पर घायल ऐसे करते है जैसे दुनिया के सारे तीर एक साथ आकर सीधे दिल को ही सीधे आघात कर निकल गए हो।

शब्दों का खेल आजकल मानो आम सी बात हो गई है जब इंसान को जीतने की गुंजाइश ही नही दिखती तब इंसान शब्दो का खेल खेलना शुरू कर देता है।

और फिर धीरे - धीरे व्यक्ति की इच्छा शक्ति को मार कर उसे खत्म कर देता है।


सरल शब्दों में शब्द की परिभाषा यही है कि वो शब्द ही तो है जो जीने की उम्मीद भी देते है और उस उम्मीद को छीन भी लेते है । जो जनाब जरा बच कर रहिएगा इन शब्दों के खेल से ये लोगो के उम्मीदों से भी जुड़े हैं और बर्बादियो से भी।

लेखिका:
अंजलि सिंह ✍️






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